Thursday, 28 May 2020

आपदाओ से निपटने के लिए राजनीतिक सामंजस्य की आवश्यकता

आपदाओ से निपटने के लिए राजनीतिक सामंजस्य की आवश्यकता

            भारत को विविधताओ का राष्ट्र माना जाता है | हमारे यहाँ भाषा से लेकर विभिन्न विचारों में भी भिन्नता है | मगर हम सभी भारतीय विविधता में एकात्मता का परिचय देते है | हमारी संस्कृति हमे एक रहना सिखाती है | हमारा देश एकात्म समाज रचना के तत्व को स्वीकार्य करता है, विघटन के नही | हम दुसरे के सुख दुःख में सहयोगी रहते है | सामाजिक जीवन चक्र एक दुसरे के सहयोग से आगे बढ़ता है | जब आज सम्पूर्ण विश्व कोरोना जैसी वैश्विक महामारी का दंश झेल रहा है | इस महामारी की दौर में हमे सामाजिक और राजनितिक सामंजस्य की महती आवश्यकता है | हमारे देश में हजारो सामाजिक संगठन और सैकड़ो प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दल है | सभी दलों के अपने-अपने राजनीतिक चिंतन है और विचाराधायें है | सब अपने विचार को सर्वश्रेष्ठ और पूर्ण समझते है | इसीलिए वह अपने विचार के विपरीत की सरकारों द्वारा लिए गए लगभग सभी निर्णयों और नीतियों का विरोध करते है | जैसे केंद्र में आज भाजपा की सरकार है जिसका नेतृत्व प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी कर रहे है | वही मान लीजिये किसी राज्य में उनके विपरीत मत की राज्य सरकार है जैसे बंगाल में ममता दीदी तो वह राज्य सरकार हर विषय पर केंद्र सरकार का विरोध करेगी | ये आज हमारे राजनीतिक चिंतन का मूल बन गया है कि हम विरोध की राजनीति करके सत्ता में रहने या आने का प्रयास कर रहे है | बात सही है कि हम अगर विरोध नही करेगे तो सरकारे मनमाने ढंग से कार्य करेगी और निर्णय लेगी | सकारत्मक नेतृत्व वाली सरकार सकारात्मक निर्णय लेगी जो समाज और राष्ट्र के हित में होगा और नकारात्मक नेतृत्व वाली सरकार नकारत्मक निर्णय लेगी | बात अगर हम आज की करे तो ध्यान में आता है इस महामारी से बचने के लिए सरकार में कई श्रेणियों में देश को बंद किया | कुछेक महीने तो सम्पूर्ण लॉकडाउन का पालन देश ने किया है |  लॉकडाउन के कारण देश में बहुत बड़ी आर्थिक और रोजगार की समस्या मुंह फैलाये हम सभी के सामने खड़ी हो गयी है इस कारण सरकार और लोगों की चिंता और बेचैनी बढ़ गई है । इन सब कारणों को मुद्दा बनाने का प्रयास देश में चल रहा है इसीलिए राजनीतिक क्षेत्र में कुछ आशाएं भी उत्पन्न की जा रही हैं । वही दूसरी तरफ, हम सभी अपने आसपास दृश्यों का अवलोकन कर रहे है की मजदूर और मध्यमवर्गीय परिवारों की रोजीरोटी पर संकट आ खड़ा हुआ है | मजदूर अपने कार्य क्षेत्रो को छोड़कर अपने निवास स्थानों की ओर पलायन कर चुके है | वह पैदल और गाड़ियों और सरकारों द्वारा की जा रही परिवहन व्यवस्था से अपने गंतव्य की ओर चले जा रहे है | व्यापर और उद्योग जगत में छोटे और मझले व्यापारी परेशान है | मजदूर नही मिलेगे तो काम कैसे आरम्भ होगा | फिर इस महामारी से बचने के लिए सरकार की नीतियों का अनुपालन करना पड़ेगा | या हम ये माने की अभी कुछ समय के लिए देश की विकास गति थम गयी है | अभी कुछ बड़ी समसामियक समस्याओ का सामना हमे करना पड़ेगा चाहे वो आर्थिक हो या खाद्यान्न को लेकर हो | इस महामारी का ईलाज अभी दूर दूर तक दिखाई नही देता है | तब तक ये बाते सामान्य होगी की नही कुछ नही कहा जा सकता है | इस सकंट के समय हमे एक दुसरे का विरोध न करके एक दुसरे के साथ सामंजस्य बनाकर कार्य करना है न की इन मुद्दो को राजनीतिक मुद्दे बनाने है | हम सभी को अपने नेतृत्व पर भरोसा रखना होगा |

            कुछ अफवाहों और उचित मदद और मार्गदर्शन न मिलने के कारण आज असंख्य प्रवासी मजदूरों का बेसहारा होकर परिवार सहित अपने गाँव और घर की और जाने का दृश्य, परिस्थिति के प्रति हमारे असंवेदनशील व्यवहार का परिचायक बन गया है, इसमें शासन और प्रशासन भूमिका महतवपूर्ण है परन्तु बड़े स्तर पर लोग मानवीय आधार पर अपने सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद लोगो की सहायता कर रहे है । मगर कुछ राजनीतिक दल इस विषय पर आधारहीन राजनीति करने का प्रयास कर रहे है | समझने की बात यह है कि इस वैश्विक महामारी के रहते न तो राजनीति समाप्त होने वाली है, और न ही प्रशासन की गुणवत्ता पर लोकतांत्रिक बहस । हकीकत में, यह देश के प्रधानमंत्री जी पर निर्भर करता है कि वे अनपेक्षित स्थिति के दौर में विरोधी आवाजों को स्वतंत्रता देते हुए भी एक राष्ट्रीय जनमत कैसे तैयार करते हैं । ऐसे प्रधानमंत्री जी सभी राजनीतिक दलों के प्रमुख पदाधिकारियों, राज्यों के मुख्यमंत्रियों, केंद्र के मंत्रियो, अधिकारियो और स्वास्थ्य विभाग से सम्बंधित लोगो के साथ निरंतर चर्चा-परिचर्चा और परामर्श ले रहे है | वह सभी के साथ सामंजस्य बनाकर निति निर्धारण कर रहे है | वह इस विषय पर राज्य सरकारों की भागेदारी भी सुनिश्चित किये है | कई दौरों में उन्होंने देश के मुख्यमंत्री गणों से परामर्श लिया और मंत्रणा की इस चुनौती से किस प्रकार लड़ा जाये | लेकिन सिर्फ भारत ही नही उन्होंने विश्व स्तर पर इस बीमारी को लेकर अन्य देशो के राष्ट्रीय अध्यक्ष और वैज्ञानिको से भी बात की है | जिसमे भारत ने अमेरिका, ब्राजील और अन्य कई देशो को  हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन को भेजा है |  अभी हमारा देश कोरोना से लड़ने के लिये तैयार है | हमारे पास कोविड-19 को समर्पित कुल 930 अस्पताल है जिसमे 158747 आइसोलेशन बेड है, कुल 20355 आई.सी.यू. बेड है और 69076 आंक्सीजन बेड है | भारत सरकार के मुताबिक 2362 कोरोना समर्पित स्वास्थ्य केन्द्रों में 132593 आइसोलेशन बेड, 10903  आई.सी.यू. बेड और 45562  आंक्सीजन सपोर्ट बेड उपलब्ध है वही हमारे पास कोविड की जाँच के लिए कुल 624 लैब है | आज 28/05/2020 तक कोरोना भारत में कोरोना के कुल 1.58 लाख केसों की पुष्टि हो चुकी है जिसमे से 67,692  लोग स्वस्थ हो चुके है और कुल 4,531 की मृत्यु हो चुकी है | वही विश्वभर में अमेरिका और ब्राजील जैसे देशो में इसके केसों और मृत्युदर की संख्या अधिक है | विश्वभर में अभी तक कोरोना के कुल 56.90 लाख केसों की पुष्टि हो चुकी है जिसमे से 23,49,598 लोग स्वस्थ हो चुके है और कुल 3,55,575 की मृत्यु हो चुकी है | ऐसे में जब हमारे पास दुनिया के बेहतरीन चिकित्सक और पैरामेडिकल स्टाफ है | हमारे यहाँ जनता सरकार का सहयोग कर रही है  | इसीलिए हमारे यहाँ अभी कोरोना के मरीजो की संख्या अन्य विकसित देशो के मुकाबले कम है | अब हमे कोरोना के साथ साथ आने वाली विपत्तियों का भी सामना करना है | हमे दुसरे पर दोषारोपण नही करना है |

            संकट के इस समय में राष्ट्रीय स्तर की बातचीत या विवादों के स्वरूप को संकुचित नहीं किया जाना चाहिए । उदराहरण के लिए , तब्लीगी जमात के कुछ अविवेकी व्यक्तियों की अनुशासनहीनता की वजह से एक पूरे सामाजिक समुदाय की निंदा के प्रयास पर प्रश्न क्यों नहीं उठाए जा सकते ? नीतिगत मुद्दों पर देश के विपक्ष को यह पूर्ण अधिकार है कि वह अपनी बातो और नीतियों को सरकार को बताये, अपनी सलाह सरकार को दे । नीतिगत मुद्दों पर सरकार का सहयोग कर सकते है और जहाँ उन्हें लगता है कि सरकार ठीक प्रकार से कार्य नही कर पा रही वहां लोकतांत्रिक रूप से सरकार का विरोध कर सकते है मगर इस विषय पर सकारात्मक और विवेचनात्मक रेवैये के साथ |  उदाहरणस्वरूप वह इस बात के लिए परामर्श दे सकता है कि देश के वंचित वर्ग की सहायता हेतु सरकार अपने राहत पैकेज को बढ़ा सकती है । हाशिए पर रह रहे वर्ग के लिए सरकार की अनुकंपा उसका दायित्व है , जिसे संविधान की प्रस्तावना में भी वर्णित किया गया है । वैसे केंद्र सरकार ने इस संकट की घडी में देश को आर्थिक रूप से संबल बनाने के लिए 20 लाख करोड़ रूपये के आर्थिक राहत पैकेज की घोषणा की है उसमे सभी के हितो को ध्यान में रखकर नीति बनाने का प्रयास नरेंद्र मोदी जी की केंद्र सरकार ने किया है |

            आज की वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हम विपक्ष से अपेक्षा कर सकते है कि उसके असंतोष का स्वर विभाजनकारी न हो । न ही वह ज्ञान या अनुभव के दम पर ऐसा दंभ दिखाए , जो प्रतिकारक हो सकता हो । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी एक ऐसी राजनीति की कल्पना करने का समय है, जो हमारे समय की चुनौतियों का सामना कर सके । आज सम्पूर्ण विश्व और हमारा देश एक नए संसार को रचने के इतिहास के चौराहे पर खड़े हैं ; उस समय यह नहीं कहा जाना चाहिए कि हमारी राजनीति अराजक अक्षमताओंया लालची अवसरवादियोंद्वारा संचालित हो सकती है । ऐसी धारणा किसी भी भारतीय राजनितिक दल को स्वयं के बारे में नही बनने देनी चाहिए | हमे दुनिया को यह बताना और दिखाना पड़ेगा की हम संकट की घड़ी में देश और समाज के साथ खड़े होते है | हम अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओ को राष्ट्रहित में त्याग देते है | आज हमे भारत में इस विचार और सामंजस्य के साथ कार्य करने वाले राजनैतिक दलों की आवश्यकता है |

            कभी कभी यह प्रश्न उठता है कि हमारी राजनीति का मानचित्र किस प्रकार का होना चाहिए और हमें इसकी सीमाओं को कैसे परिभाषित करना चाहिए ? इसकी शुरूआत हम एक ईमानदार पावती के साथ कर सकते हैं । आज हमे यह स्वीकार करने का वक्त है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और चिकित्सा अनुसंधान के लिए अल्प वित्तीय आवंटन और अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवा प्रणाली मानव स्थिति के प्रति संवेदनशीलता के असफल होने का संकेत देती है । हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि सभी प्राणियों का जीवन अंतर्संबंधित है । यह भी कि एक अच्छे जीवन के लिए चरम का त्याग, और संयम को अपनाना अत्यावश्यक है । मगर इसकी जिम्मेदारी हम सिर्फ सरकार पर नही डाल सकते यह हम सभी की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम सरकार के सहयोग कार्यो में अपना योगदान दे | हम आर्थिक और सामाजिक प्रगति एक साथ करे | हमे फिर से अपने जीवन को प्रकृति के नजदीक ले जाकर उसका सम्मान करते हुए उसे अपने जीवन में अपनाना पड़ेगा |

            वर्तमान स्थिति, पारिस्थितिक अधिकता के बीहड़ों, सामंजस्यपूर्ण जीवन के सिद्धांतों के उल्लंघन और एक व्यक्ति के आंतरिक और सामाजिक जीवन के बीच संतुलन के बारे में वार्ता करना चाहती है । यह संकट, परिवार और मित्रों के सतत् भावनात्मक बंधनों के प्रति हमारी उपेक्षा के लिए हमें चेता रहा है वह हमे रिश्तो के महत्व को समझने की प्रेरणा दे रहा है । यह जीवन के आधारभूत सत्य को हमारे सामने ला रहा है | वह आपस में मतभेदों और मनभेदो को समाप्त कर एकात्म होने की प्रेरणा हमे दे रहा है | इसने हमे रिश्तो की अहमियत को सिखाया है | भले ही हमने इसके डर से ये सब किया परन्तु आज हमे अपनी सामाजिक उत्तरदायित्वो का बोध भी हुआ है | जीवन नश्वर है और भौतिक सम्पदा का मोल सिमित है | आज हम में इन सब तथ्य पूर्ण बातो का चिंतन जाग्रत हुआ है |

            इस समय ने हमें स्वयं से यह प्रश्न करने को विवश कर दिया है कि आध्यात्मिक समाज में करूणा का भाव कैसे आया ? चिकित्सकों के साथ की जा रही मारपीट और बर्बरता के साथ एक पुलिस अधिकारी का हाथ काट दिए जाने जैसी गंभीर विपत्तियों को दूर करना हमारी राजनीति का अंतिम उद्देश्य होना चाहिए । इन सभी अमानवीय घटनाओं की निंदा या आलोचना कर देने से समस्या का समाधान नही निकलेगा । आधुनिकता की चुनौतियों से निपटने के लिए राजनीति और एक कल्याणकारी राज्य की पुनरावृत्ति की जानी चाहिए । हमें अपनी प्रणालियों की अपर्याप्तताओं, गलत प्राथमिकताओं के विनाशकारी परिणामों, भूख और निराशा के खिलाफ गलत उपायों के बारे में सजग रहना चाहिए, ताकि इनको संबोधित करके, हम एक न्यायसंगत और समावेशी सामाजिक व्यवस्था के करीब जा सकें

            आओ हम सभी मिलकर नए भारत में राजनीति को, ‘आदर्श को साकार करने वाला खेलबनाने का उच्चतम  प्रयास करें । आज हमें एक ऐसे नेतृत्व की जरुरत है, जो लोगों में आशा का भाव जगाये, और उन्हें साकार करने की क्षमता प्रदान करे । हमारी इच्छाशक्ति तो ऐसे समाज की स्थापना करना चाहती है, जो हृदयों का विस्तारकरे । एक ऐसा समाज, जिसमें आर्थिक दक्षता और सामाजिक न्याय असंगत नहीं हो ; एक ऐसा समाज  जो जीवन और आजीविका की एकता को पहचानने से इंकार नहीं करता हो ; एक ऐसी सामाजिक व्यवस्थाए जहाँ कानून समान रूप से लागू होता हो ; एक ऐसी प्रणाली, जो सभी की मानवीय गरिमा के लिए प्रतिबद्ध हो

            मान. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को जानकारी है कि लोकतांत्रिक शक्ति स्थायी रूप से केवल नागरिको के स्नेह और कृतज्ञता की नींव पर खड़ी हुई है । वर्तमान में हम संतोष के साथ कह सकते हैं कि उन्होंने जीवन और आजीविका के प्रबंधन के लिए, राजनीतिक नेताओं और राज्य सरकारों को शामिल करके अच्छा कार्य किया है

            हम सभी को यह सदैव ज्ञात रखना चाहिए कि इतिहास किसी व्यक्ति की देन नहीं है । अतःआज जो  मानवता के अस्तित्व के लिए युद्ध लड़ा जा रहा है वह समग्र और सामूहिक रूप से लड़ा जाये , और जीता जाये । हम सभी पहले भारतीय है ,बाद में कुछ और हमे हमेशा इस बात का ध्यान रखना है | दलों का गतिरोध समाज के हितो के रक्षण के लिए हो न की स्वयं के सरक्षंण के लिए |  

 

श्रवण बघेल

(लेखक पीएचडी शोध छात्र हैं और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन पर शोध कर रहे)