Tuesday, 8 June 2021

नेतृत्व....

 

नेतृत्व....

नेतृत्व, समाज को दिशा दिया करता हैं,

संकट आने पर वह साथ दिया करता हैं,

वह कभी नही झोंकता लोगों को तूफानों में,

खतरे आने आने पर वह स्वयं खेला करता हैं।  

नेतृत्व होता है योग्य अपने, समाज को सही दिशा में ले जाने में,

अगर हुई थोड़ी भी चूक तो वह न गिरा करता हैं,

होकर तैयार सीना तान वही मुसीबतों से लड़ा करता हैं,

पहचान वक्त की नब्ज वह सूझबूझ से लेता काम,

सही निर्णय ले वह सफलता से कर देता है जनता के काम।

‘बढे चलो’ का नारा देकर, नेतृत्व कभी न रहता पीछे,

नेतृत्व सदा आगे बढ़कर मार्ग हमें दिखलाता हैं,

पीछे रहकर वह कभी न करता अपने लिए आराम हैं,

गोली खा सीने पर वह बचाता सबका आत्मसम्मान हैं,

डरता नही वह कभी मुश्किल वक्त से हिम्मत से लाड़ लड़ाता हैं,

निरंतर चलकर सबको मंजिल तक वह पहुंचता हैं।      

केवल कुछ लोगों का हित जो सोंचे वो नेतृत्व नही बन सकता जन जन का,

नेतृत्व वही बन सकता जो दिशा दान कर सके सबका,

नेतृत्व न करता भेदभाव कभी, एकभाव के साथ करता बर्ताव सही,        

नेतृत्व न देता भाव कभी लच्छेदारी बातों को,

जिंदगी लगा देता वह निज आन-बान-शान के लिए।

पिछलग्गू पैदा कर लेना नेतृत्व नहीं,

नेतृत्व नहीं हू-हू कर पत्थर फिकवाता,  

नेतृत्व देश के दीवाने पैदा करता,

भगत सिंह और श्री गुरूजी जैसे परवाने पैदा करता हैं,

बोस और पटेल जैसे शेरे हिन्द जैसा जज्बा पैदा करता हैं,

लाठी, डंडो और गोली से न डरता वह तो हिम्मत वाले काम जनता के लिए कर जाता हैं।

नेतृत्व देखता देश, देश की खुशहाली,

नेतृत्व नहीं देखता स्वयं को, अपनों को,

नेतृत्व, हमेशा खुदी मिटा कर चलता है,

पालता नहीं आँखों में सुख के सपनों को।।

                                        -डॉ श्रवण बघेल

जो आज है वो कल तो नही....

 

जो आज है वो कल तो नही....

जो आज है वो कल नही, जो कल था वो आज नही,

 ये साँझ का साया ये भोर की काया सतत तो नही,

 ये दर्द भरी रात ये सुख भरे दिन, आज है तो कल नही|

जब मैं निकालता हूँ अक्सर इन रास्तों पर तो ख्याल आता हैं,

ये शहर ये मोहल्लें कही कोई पुराने जंगल तो नही|

जो आज है वो कल तो नही|

यकीन मानिये आप में कुछ खास हैं, इसीलिए आप और हम आज भी साथ हैं|

मैं जी रहा हूँ तिल-तिल भर मेरा घर मक़्तल-ए-शहर तो नही,

कहीं पर छा गया काली घटा बनकर, कहीं बरसा मैं एक आवारा बदरा होकर,

हस्तियाँ भी मिट गयी मजबूत दीवारों की, मगर मेरी आदतों का शुरुर इतिहास बन यूँ ही गुनगुना रहा है|

                                         -डॉ श्रवण बघेल

नेताओं की कहानी....

 

नेताओं की कहानी....

आओ आज सुनाऊँ आपको हम राजनेताओं की कहानी,

अपनी जुबानी, कुछ सुनी कुछ अनुसुनी सी कहानी,

हम  नेता हैं जी सिर्फ नेतृत्व करना जानते हैं,

न मंदिर को जानते है, न मस्जिद को जानते हैं,

हम इंसान हैं इंसानियत को पहचानते हैं,          
हम भूखे पेट को रोटी और जरूरतमंद की जरुरत को जानते हैं|

तपत्यागस्नेह से सदैव करते हम अपना काम हैं,

थकान, भूख-प्यास नही कर सकते हमें परेशान हैं,

जनता की सेवा करना ही कर्म और हमारा ईमान हैं,

एक छोटा सा शब्द “नेताजी” हमारी क्षमताएं बढ़ा देता हैं,

वही हमें कभी नेता और कभी अभिनेता बना देता हैं,

हम सभी के साथ रोते और हंसते हैं, हर खुशी और गम में सबके साथ सदैव होते हैं|

बनते है सहारा बे-सहारो के लिये, बनते है किनारा बे-किनारो के लिये हम,      
जो हम जीये अपने लिये तो क्या ही जीये, हम जीते है हज़ारो के लिये|

सियासत की रंगत में हम ना डूबा करते है,

देश समाज के लिए हम दिन-रात जुटा करते है,

हम अपने वायदे जुबान को जरुर पूरा किया करते है,

गर तुम्हे अपनी जुबां दी हमने तो कभी न पीछे हटा करते हैं|

क्या खोया, क्या पाया मैंने, मिलते और बिछुड़ते इस मग में,

मुझे किसी से न शिकायत, बस मैं यूँही चलता रहूँ पग पग अपने मग में|

                                    -डॉ श्रवण बघेल

Monday, 7 June 2021

नाराज....

 

नाराज....

अंदरुनी और बाहरी कश्मकश के बीच मैं खुद को अकेला सा पाता हूँ,

राहत पाने की उम्मीद में बस मक़बूल होकर खुद को खुदा के नजदीक पाता हूँ,  

मन की बात को किसे कहूँ अब ये न मैं समझ पाता हूँ,

हर दिल अज़ीज़ खुद की शख्सियत के साथ कुछ वक्त बिताना चाहता हूँ।

जीवन का सर्वेक्षण और विश्लेषण कर नाराज लोगो को अब मैं मानना चाहता हूँ,

रगों और रेखाओं का फनकार होकर अब सब को हँसाना चाहता हूँ।

डर और आलस्य को त्यागकर, उजालों की उम्मीद को जमीं पर लायेंगे,

घने बादलों को चीरकर, सूरज की रोशिनी से धरा को नहलायेंगे।

जो हमसे कफा हुए, हम उनसे न अब दूर रह पाएंगे,

अपनी खाताओं को मानकर अब हम फिर पहले जैसे बन जायेंगे।

नाराज क्यूँ बैठे हो अब फिर किस बात पे हो रूठे,
अच्छा चलो ये माना तुम सच्चे हम झूठे हैं।।

                                        -डॉ श्रवण बघेल

आवाज़ों के घेरे में....

 

आवाज़ों के घेरे में....

सहज और सार्थक अभिव्यक्ति मैं अब करना चाहता हूँ,

आवाजों के घेरे में अब मैं खुद को बुलन्द रखना चाहता हूँ,

मुक्तछन्द की तरह अब मैं हर शब्द में गुजना चाहता हूँ,

धुआँ-धुआँ होती अपनी शख्सियत को आवाज़ देकर पहचान दिलाना चाहता हूँ,

आवाजों के घेरे में अब मैं खुद को बुलन्द रखना चाहता हूँ।

निरर्थकता और ठहराव के बोध से अब खुद को आजाद कराना चाहता हूँ,

सार्थक और गतिशील होकर छटपटाहट और द्वन्द से भरी इस जिंदगी से खुद को ऊपर उठाना चाहता हूँ,

आवाजों के घेरे में अब मैं खुद को बुलन्द रखना चाहता हूँ।

जलते हुए वन के बसन्त का अब मैं रहबार होना चाहता हूँ,

आवाजों के घेरे में अब मैं खुद को बुलन्द रखना चाहता हूँ।।

                                        -डॉ श्रवण बघेल

सुन समन्दर....

 सुन समन्दर....

सुन समन्दर मैं तेरी तरफ आता हूँ,

भागीरथ की गंगा को फिर तुझमें मिलाता हूँ,

नही डर लगता मुझे अब तेरी गहराई से,

सच पूंछ मैं तुझसे नजर से नजर मिलाने आया हूँ।

मैंने तेरी नदी से थोडा सा पानी क्या लिया?

तूने तो मुझ पर सितम ही ढा दिया,

तुझे गुरुर है तू बहुत बलशाली हैं,

मैं चिड़ियाँ बन तेरा गुरुर लेने आया हूँ,

तुझे लगता है ये छोटी चिड़िया क्या तुझे मिटाएगी?

छोटी-छोटी अपनी चोच में ये बार बार रेत भर लाएगी,

मिटा देगी ये अपनी हस्ती तेरा गुरुर मिटाने में,

मत टकरा बेवजह इसका घोंसला तू मिटाने में।

तोड़ दे तू अब अपनी भ्रम की ये दीवारे,

रख हौंसला की वो मंज़र भी अब आएगा।

ओSSS समन्दर तू खुद एक दिन मेरे पास आएगा।। 

                                       -डॉ श्रवण बघेल

टूटी चप्पल की कहानी....

 

टूटी चप्पल की कहानी....

आओं सुनाऊ टूटी चप्पल की कहानी,

अपनी जुबानी, उनकी जुबानी, बड़े सघर्षों की है इसकी कहानी,

संघर्षो के पथ पर इसने मुझे चलना सिखाया,

अंगारों से न इसने डरना सिखाया,

झेल गयी ये खुद मेरे पावों में उठे दर्द को,

खुद रहबर बनकर मुझे उठाना सिखाया,

खुद को कुरबां कर दिया मेरी मंजिल की खातिर,

उफ्फ्फ... सी भी न की जब मोची ने सुआ घुसाया।

टूटी हुई इस चप्पल ने मेरी सफलता तक अपना साथ बिना मोलभाव के यूहीं निभाया।  
 

                                        -डॉ श्रवण बघेल