Monday, 7 June 2021

क्या तेरा क्या मेरा है....

 

क्या तेरा क्या मेरा है....

सांसें मिली है कुल दो चार हमको,

हवा में क्या तेरा क्या मेरा है?

ये गहरी रात का अँधेरा है,

पार उसके नया सबेरा है।

राह में अब मुझे रुकना है और न थकना है,

राह के पार मेरी मंजिल है मेरा डेरा है।

आज नीरव है उसको रहने दो,

कल के कलरव का मुझको बेरा है।

रहजनों से तो बच के निकला था,

मुझको रहबर ने आकर घेरा है।

तुम तो आगे बढ़ो तबर वालों,

अभी ये वन बहुत घनेरा है।

ये जां अब किसकी पैरवी में चले,

यहां मुंसिफ ही तो लुटेरा है।

                     -डॉ श्रवण बघेल

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