जीवन की शतरंज बिछी है....
जीवन की शतरंज बिछी हैं, मनुष्य इसके मोहरे हैं,
कोई राजा कोई रानी, कुछ चेहरे दोहरे हैं।
ऊँट, सवारी, घोड़े, हाथी, पैदल चलते प्यादे हैं,
कोई सीधा कोई ढाई, कोई तिरछा, कितना बोझा लादे हैं।
ऊँचा नीचा काला गोरा, यहीं जिंदगी में होता हैं,
हार जीत के अंकुर फूटें, वही काटता जो बोता हैं।
राजा रानी कहने भर को क़ुरबानी सैनिक देते हैं,
घोर सियासी वजीरे आज़म, चौपट चौसठ घर होते।
सब होते जो एक बराबर, स्वर्ग धरा पर ही मिलता,
खुशियों की इस फुलवारी में, जीवन पुष्प सदृश खिलता।।
-डॉ
श्रवण बघेल “गुरु भाई”
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