जीवन में संघर्ष अभी अधूरा है....
“जीवन में संघर्ष
अभी अधूरा है।”
जो पाया और न पाया परन्तु मेरा कर्म अभी अधूरा हैं,
जीवन में संघर्ष अभी अधूरा है।
अपनी जान हथेली पर रख दे,
आहुति लहू की तू दे,
अभी मंज़िल दूर खड़ी है, देख चट्टानों से भी बड़ी हैं।
उठा हाथ, कर सिंघनाद की थारायें ये धरती,
जो कहे तू मूर्ख है
दिखा उसको अपनी प्रबल इच्छाशक्ति।
चिर दे भुजबल उस पर्वत का जो बन जाए रोड़ा,
भूल मत अभी सपना नहीं हुआ है पूरा।।
उठा कलम लिख इतिहास नया,
गर कुछ भी ना हो तेरे पास,
लक्ष्य भेदी बन अर्जुन सा, जो मिले ना गुरु
एकलव्य बन जा, कर अर्पण कवच कुण्डल
जो मांगे आहुति शीर्ष कमल
उठ…
बैठा क्यों है?
बस एक हथौड़ा बाकी है,
जीवन मूर्त बनाने में अब न समय काफी हैं।
मत बैठ तू अब यूँही तन्हा
अपना जीवन दीप जला
भस्म कर दें खुद को खुद अपनी राख से अपनी मंजिल बना,
न डर, न रुक, बस चल अपना लक्ष्य स्वयं बना।
जो पाया और न पाया परन्तु मेरा कर्म अभी अधूरा हैं
जीवन में संघर्ष अभी अधूरा है।।
-डॉ
श्रवण बघेल “गुरु भाई”
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