Tuesday, 8 June 2021

जो आज है वो कल तो नही....

 

जो आज है वो कल तो नही....

जो आज है वो कल नही, जो कल था वो आज नही,

 ये साँझ का साया ये भोर की काया सतत तो नही,

 ये दर्द भरी रात ये सुख भरे दिन, आज है तो कल नही|

जब मैं निकालता हूँ अक्सर इन रास्तों पर तो ख्याल आता हैं,

ये शहर ये मोहल्लें कही कोई पुराने जंगल तो नही|

जो आज है वो कल तो नही|

यकीन मानिये आप में कुछ खास हैं, इसीलिए आप और हम आज भी साथ हैं|

मैं जी रहा हूँ तिल-तिल भर मेरा घर मक़्तल-ए-शहर तो नही,

कहीं पर छा गया काली घटा बनकर, कहीं बरसा मैं एक आवारा बदरा होकर,

हस्तियाँ भी मिट गयी मजबूत दीवारों की, मगर मेरी आदतों का शुरुर इतिहास बन यूँ ही गुनगुना रहा है|

                                         -डॉ श्रवण बघेल

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