नाराज....
अंदरुनी और बाहरी
कश्मकश के बीच मैं खुद को अकेला सा पाता हूँ,
राहत पाने की उम्मीद
में बस मक़बूल होकर खुद को खुदा के नजदीक पाता हूँ,
मन की बात को किसे कहूँ
अब ये न मैं समझ पाता हूँ,
हर दिल अज़ीज़ खुद की शख्सियत के साथ कुछ वक्त बिताना चाहता हूँ।
जीवन का सर्वेक्षण और विश्लेषण कर नाराज लोगो को अब मैं मानना चाहता हूँ,
रगों और रेखाओं का फनकार होकर अब सब को हँसाना चाहता हूँ।
डर और आलस्य को त्यागकर, उजालों की उम्मीद को जमीं पर लायेंगे,
घने बादलों को चीरकर, सूरज की रोशिनी से धरा को नहलायेंगे।
जो हमसे कफा हुए, हम उनसे न अब दूर रह पाएंगे,
अपनी खाताओं को मानकर अब हम फिर पहले जैसे बन जायेंगे।
नाराज क्यूँ बैठे हो अब फिर किस बात पे हो रूठे,
अच्छा चलो ये माना तुम सच्चे हम झूठे हैं।।
-डॉ श्रवण बघेल
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