आवाज़ों के घेरे में....
सहज और सार्थक अभिव्यक्ति मैं अब करना
चाहता हूँ,
आवाजों के घेरे में अब मैं खुद को बुलन्द रखना चाहता हूँ,
मुक्तछन्द की तरह अब मैं हर शब्द में गुजना चाहता हूँ,
धुआँ-धुआँ होती अपनी शख्सियत को आवाज़ देकर पहचान दिलाना चाहता हूँ,
आवाजों के घेरे में अब मैं खुद को बुलन्द रखना चाहता हूँ।
निरर्थकता और ठहराव के बोध से अब खुद को आजाद कराना चाहता हूँ,
सार्थक और गतिशील होकर छटपटाहट और द्वन्द से भरी इस जिंदगी से खुद को ऊपर उठाना
चाहता हूँ,
आवाजों के घेरे में अब मैं खुद को बुलन्द रखना चाहता हूँ।
जलते हुए वन के बसन्त का अब मैं रहबार होना चाहता हूँ,
आवाजों के घेरे में अब मैं खुद को बुलन्द रखना चाहता हूँ।।
-डॉ श्रवण बघेल
No comments:
Post a Comment