सांसों पर समझौता....
जिन्दगी मिली है एक बार हमकों
तो हर सांस से अब समझौता किसलिए,
यह गहरी रात का अँधेरा हैं,
आने वाला कल फिर एक नया सबेरा हैं,
न थंका हूँ अभी मैं न मुझे अभी थकना हैं,
अभी मंजिल की ओर चल रहा हूँ,
मगर मुश्किलों की रात का काला अँधेरा हैं,
अभी बैठा हूँ मै मंजिल की राह में,
आनेवाले कल का मुझे बेरा हैं,
रहजनों से तो भाग निकला था,
अब मुझे रहबरों ने आकर घेरा हैं,
आगे आगे बढ़ो तबर वालों,
अभी यह वन बहुत घनेरा हैं,
अब जिंदगी का काफिला किसकी पैरवी में चले,
इसी बात का ना हमें बेरा हैं,
मेरी साँसों का ना जाने कौन लुटेरा हैं,
जिन्दगी मिली है एक बार सबको
तो हर सांस से अब समझौता किसलिए?
-डॉ श्रवण बघेल
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