लक्ष्य भी हैं....
लक्ष्य भी है, मंजर भी है, चुभता मुश्किलों का खंजर भी हैं,
प्यास भी है, आस भी है, ख्वाबों का उलझा एहसास भी हैं।
रहता भी हैं और सहता भी है, बनकर दरिया सा बहता भी है,
पाता भी है और खोता भी है, लिपट लिपट रोता भी है।
थकता भी है, चलता भी है, कागज सा दुखों में गलता भी है,
गिरता भी है, संभालता भी है, उठकर नए सपने बुनता भी हैं।।
-डॉ श्रवण बघेल “गुरु
भाई”
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