Wednesday, 2 June 2021

मन की लिखूँ तो....

 

मन की लिखूँ तो....

मन की लिखूं तो शब्द रूठ जाते हैं और सच लिखूं तो अपने रूठ जाते हैं,

जिंदगी को समझना बहुत मुश्किल है जनाब, कोई सपनो की खातिर अपनों से दूर रहता हैं और कोई अपनों की खातिर सपनो से दूर....

किसी ने सच ही कहा कि जिन्दगी को कुछ ऐसे जिओं,

 न मुंह छुपा के जिएँ हम ना सर झुका के जियें,

सितमगारों की नजर से नजर मिला के जियें,

अब एक रात कम जियें तो हैरत क्यूँ, कि जब तलक जीयें, मशाले जला के जीयें।।   

                             -डॉ श्रवण बघेल “गुरु भाई”

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