साजिश और शिकार....
हम तो साजिशों के
शिकार हो गए यारों।
न था कोई कुसूर मेरा, खामखा हम यूहीं गुनहेगार हो गए यारों,
कर दी थी फ़ना हमने यूँही
सभी हसरतें अपनी,
मगर फिर भी अपनों की
नज़रों में बेकार हो गए,
गैरों का सहारा लेने
की हसरतें न थी अपनी,
अपने तो यूँही बेगरज
हो गए,
दूसरे उन्हें अपने
लगने लगे,
हम तो उनकी आँखों में
अंगारा हो गए|
अपनों से दूर होकर
देखा हमने दुनिया का ये तमाशे मंजर,
हर जगह मुझे नजर आया
एक अपने जैसा समन्दर,
गहराई और खुद्दारी को
साथ लिए,
अब हम भी भटक रहे है द्वारे
द्वारे,
हर कोई दिखाता है अब
हमें आईना,
मगर अब हम बद्सुरते
बेहाल हो गए,
नही छोड़ी हैं हमने
उम्मीद दामन की,
क्योकि सपने अब हमारे चश्मे
बद्दूर हो गए,
देखा अब हमने रिश्ते नही बनते आसानी से,
बनते है अब रिश्ते आपकी हैसियत के हिसाब से,
कुछ लोग अब दौलत के
यार हो गए|
किसी को समझ ना आती अब
नेकियां हमारी,
कुछ लोग अब छल कपट के
सरदार हो गए|
यारों, खुश है हम सहकर
आफतों का ये दौर,
इन सब में न जाने अब
कितने चहरे नमूदार हो गए।
खुशामद न करेंगे अब किसी
की,
वो तो गवा के ज़मीर अपना, खुद्दार हो गए।।
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