जीवन है मेरा प्यासा....
है निराशा है हताशा
जीवन है मेरा प्यासा
पाप पुण्य के फेर में
जीवन फंसा है आधा-आधा।
कर्म धर्म की ये धरा
मायावी है वसुंधरा,
अखंड काल का कराल
विशाल वैभव है भरा।
भय नही है मौत से
क्षय हुआ मैं शोक से,
दया धर्म दान दक्ष
छीन लिया मुझसे।
क्या पता तुम्हे
जीवन मेरा एक रोग है,
न वैद्य है न औषधी
यह कैसा विषम संयोग है।
भाग्य मेरा भाग्य नही
शक्ति रूप छल सही,
खंड खंड हिल रहा
प्रलय कालरात्रि नाच रही।
है निराशा है हताशा
जीवन है मेरा प्यासा।।
-डॉ
श्रवण बघेल “गुरु भाई”
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