|| जिंदगी एक किताब है ||
हम सभी की जिंदगी एक
किताब की तरह से है | जैसे किताब के हर पृष्ठ को पलटने पर कुछ नया मिलता है, ठीक
उसी प्रकार से जब जिंदगी की दौड़ आगे बढ़ती है तो हर दिन कुछ नया सिखाती है | जब हम
कहते है कि जिंदगी एक किताब क्यों है ? क्योकि इस किताब की कहानी शुरू होती है जब
हमारा जन्म हुआ तब इस किताब का पहला पन्ना खुला जो एक कोरे कागज की तरह था जिस पर
अभी जिन्दगी की जिम्मेदारी की इबारत लिखी जानी बाकी थी | फिर जैसे जिन्दगी की
यात्रा आगे बढ़ती गयी वैसे ही इस किताब के पन्ने पलटते गए, पलटते गए और जब यात्रा
रुकी तो किताब का आखिरी पन्ना भी पलटना बंद हो गया |
जिंदगी एक किताब है ऐसा कहना हम सब का विचार ही तो है जो हम सभी
की जिंदगी में कही न कही कभी न कभी घटित हुई कोई घटना को, या यों कहा जाये कि हमारी
जिंदगी का हर वो पहलू जिसे या तो हमने बहुत खुशी से जीया हो या वो पल जिसने हमे
निराशा के अंधकार में डुबो दिया हो और तभी हमे कोई उजाले की नई किरण नजर आ गयी हो,
वही किरण किताब का वो अध्याय है जो जीवन को एक नयी दिशा प्रदान करता है |
हमारी जिंदगी का हर दिन हमें एक नया
पाठ पढ़ा कर जाता है । रोज कितने ही किस्से जुड़ते हैं कुछ भूल जाने वाले और कोई कोई
मन और दिमाग पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं । कभी हम अपने बीते समय को सोचकर खुश होते
हैं, तो कुछ कटु बातें या घटनाएं
दिल कचोटती हैं । जीना
तो वर्तमान में ही है और न ही जीवन की वास्तविकता से दूर भागा जा सकता है ।
समझदारी इसी में ही है कि अपने को व्यस्त रखा जाए ताकि पुरानी दुखी बातें हमारे आज
पर हावी न होने पाए और भविष्य अंधकारमय न हो जाए ।
गौर से देखें तो जीवन खुशियों से भरा खजाना है । हर नए दिन का
स्वागत मुस्कुराकर और जोश से भरकर करने पर दिन के अंत में जो खुशी और आत्मसंतुष्टि
मिलती है, वह नायाब होती है । हैरान
होंगे यह सोचकर, कि
आप इस दुनिया के सबसे खुश और भाग्यशाली मनुष्य है ।
हां...ऐसा कभी कभी जरूर होता है जब
उम्मीदों के सभी दरवाजे आप पर बंद हो जाते हैं और विश्वास डगमगाने लगता है, मायूसी और निराशा के बादल
छंटने का नाम नहीं लेते हैं । ऐसे समय में केवल धैर्य और सहजता के हथियार ही आपकी
ढाल बनते हैं और आशा की हल्की किरण दिखती है । बस उसी किरण को पकड़ कर उजालों को
तलाशना शुरू कर दें ।
बीते समय की दुखी बातों को एक गठरी
में बांधकर कहीं छिपा देना ही आज और आने वाले कल के साथ सही इंसाफ होगा । अपने जीवन की किताब के
आप स्वयं ही लेखक हैं और कोई नहीं आएगा आपके जीवन की किताब के खाली पन्नों को लिखने
और उनमें रंग भरने के लिए ।
हम सब की जिंदगी एक किताब की तरह है, जब यह किताब खुली तब, जब हमारा अवतरण इस भूमि पर
हुआ । और आसानी से समझे तो ईश्वर ने हमारी रचना की तो उसने सबसे पहले इस किताब का
पहला कवर, पन्ना नहीं, कवर जो पहले होता है, उसको लिखा
और उसे खोला — हमारे
पैदा होते ही हमारे जीवन का अध्याय लिखना आरम्भ हो गया था जिसका लेखनकर्ता स्वयं
ईश्वर है । और उसके बाद हर दिन हमको एक नया पन्ना मिलता है और जीवन की नई चुनौतिया
भी मिलती है और जीने की नई राहे । जीवन की किताब के ये पन्ने पलटते रहते है अब इस
पर लिखो या कुछ न लिखो |
यह पन्ने जीवन की रफ़्तार के साथ खुद बीते हुए कल को समेटे हुए, आने वाले कल की
चिंता किये बिना | इस किताब के पन्नो में संवेदनशीलता नही है इन्हें तो पलटना है
बिना किसी बात की परवाह किये और यह पलटता रहेगा, पलटता रहेगा, पलटता रहेगा, पलटता रहेगा, पलटता रहेगा । कब तक ? जब तक जिंदगी आखिरी पन्ना
पलट नहीं जाता और वह आखिरी पन्ना कब है ? जब
जीवन की अंतिम साँस का वहाब बंद हो जायेगा । यह इस किताब और हमारे जीवन का अंत
होगा ।
जैसे ही इस जिंदगी की किताब का आखिरी
पन्ना बंद हो जायेगा इसके बाद हमारा कोई नाता नहीं है । इस मायारूपी संसार से हमारे
सारे रिश्ते नाते टूट जायेंगे । हमे जब जलाया या दफनाया जायेगा । तब उम उसका विरोध
भी नही कर पाएंगे । हमारा भय समाप्त हो
जायेगा | हम इस जीवनरूपी किताब में अपने अच्छे और बुरे कर्मो का लेखा जोखा छोड़कर
जायेगे | लोग उसी आधार पर आपके जीवन की किताब का अध्ययन करते है, उस पर चर्चा करते
है | उसी आधार पर आपके यश और अपयश का आंकलन करते है | बड़ी ही अजीब पहेली है यह
जिंदगी |
हम सभी अपने जीवन के हर पहलु को जानते
है | हमे सभी को यह बात अच्छे से मालूम है कि यह होना है जो नियति में लिखा है हम
उसे बदल नही सकते मगर प्रयास कर हम उसमे सुधार तो कर सकते है | गलतियों को सुधारना
और गलतियों के लिए माफ़ी यह जीवन का एक बड़ा सूत्र है | हम अपनी जिंदगी के बारे में
बहुत लम्बे समय तक तो कुछ सोचते ही नही क्योकि बचपन में हमे इतने व्यस्त होते हैं, खेलने में, कूदने में, सीखने में, खिलौनों में । फिर थोड़े बड़े
होते हैं, स्कूल जाते हैं, उसी में इतना व्यस्त हो जाते
हैं कि इसके बारे में हमे सोचने का वक्त भी नही मिलता । उसके बाद जवान होते हैं, तो जोश का नाम ही जवानीहै ।
और जब जीवन में जवानी का नशा चढ़ता है तो हमे अपने बड़ो की बाते बेकार लगती है हम उसे
अपनी निजी जिंदगी में दखल मानते है कुछ लोग खुद को संभालकर महान बन जाते है और कुछ
लोग सामान्य जीवन जीते है और कुछ खुद पर बोझ । मगर हम इस मृत्यु लोक के मायाजाल में
इतने उलझ जाते है कि हमे समय का ख्याल ही नही रहता क्योकि हमारे जीवन के अध्याय में
समय और पन्ने निश्चित है वो न हमे कम मिलेंगे और न ज्यादा | धीरे धीरे समय बीतने पर
हमे समय का ख्याल आता है । जब समय का
ख्याल आता है तब अहसास होता है कि समय कितनी तेजी से चल रहा है । और
आते-आते-आते-आते-आते आते, जैसे
ही, और जैसे ही पन्ने पलटते हैं
और किताब का अंत आने लगता है, उतना
ही समय ऐसा लगता है कि और तेज भाग रहा है, और
तेज भाग रहा है, और
तेज भाग रहा है, और
तेज भाग रहा है । जीवन की रफ़्तार बहुत तेज है | हो सकता यह लिखते समय मेरे समय भी निकट
हो | वैसे आजकल बहुत कम होता है की लोग कुछ पढ़ते है गहराई में जाकर मगर लिखने वाला
अपने मन के भाव को शब्दों में लिखता है |
अच्छा-अच्छा,... ये मनुष्य की बात है क्योंकि
समय अपनी रफ़्तार से चल रहा है वो किसी की भी परवाह नही करता न राजा की न ही रंक की
, समय समरसता के भाव से कार्य करता है । न वो ज्यादा तेज चलता है, न वो धीरे चलता है । वो एक
ही रफ्तार से चल रहा है परंतु मनुष्य ही एक ऐसा है जिसको यह अहसास होता है कि अब
धीरे धीरे चल रहा है, अब
तेज चल रहा है। अब ये चल रहा है, अब
वो चल रहा है । तो मतलब, मनुष्य
की हालत यह है कि वो किसी भी इस संसार के दायरे में स्थायी नहीं है । कोई ऐसी चीज
नहीं है उसके संसार के अंदर जिससे कि वो नाप सके कि मैं अब इतनी दूर हूं, यहां से मैं इतनी दूर हूं, मैं यहां से अब इतनी दूर हूं
। अब यहां से इतनी दूर हूं । ना !
यह तो वो वाली बात हो गयी कि जैसे ही
वो उस किताब के अंत में आने लगता है तो उसको लगता है कि इसमें तो ज्यादा पन्ने ही
नहीं बचे । और जितने पन्ने निकल गये, उसको
वो गिन ही नहीं सकता । उसकी कोई कदर ही नहीं है । उसको ये नहीं है कि मैं कितना
भाग्यशाली हूं कि मेरे को 70 साल
मिले, 80 साल मिले, 40 साल मिले, 50 साल मिले, 60 साल मिले । ध्यान ही नहीं है
। क्या देखता है उसमें भी ? कितने
बचे हैं ?
तो जो कितने हैं, इस चीज को जानता ही नहीं है
वो धनवान कैसे बनेगा ? क्योंकि
उसके लिए जितना आये, उतना
ही कम है ।
उस दिन जब हमे यह संसार छोड़कर के जाना
होगा, इसमें हम सबको सबसे बड़ी बात
क्या लगती है ? रोना
तो हमको आता है न कि हमको अपने प्रिय सगे संबधियो, अपने मित्रों को छोड़ना पड़ेगा! अपनी
अधूरी इच्छाओ और सपनो को छोड़ना पड़ेगा | सम्पत्ति और ज्ञान को छोड़ना पड़ेगा | हम इस संसार
से कुछ लेकर नही जायेगे बस अपने कर्मो से लिखी
गयी अपनी किताब को छोड़कर जायेगे | कभी कभी लगता है की हमारे पास दुखी होने के लिए कोई
ठोस कारण नही है अगर हम अपने जीवन में राग और द्वेष का भाव समाप्त कर दे और समान्तर
जीवन का दृष्टिकोण अपना ले तो अपने अंतिम समय तक हमे खुद से निराश नही होना पड़ेगा |
क्योकि हमारे दुःख का कारण सिर्फ मै है और कुछ नही | जिस मनुष्य ने अपनी जिंदगी की
किताब में से मै का भाव हटा दिया और हम का अध्याय जोड़ दिया सच मानिये उसे अच्छी किताब
कोई लिख नही सकता | इश्वर हमे सदैव अच्छे कार्यो को करने की प्रेरणा देता | क्योकि
वही हमारी किताब की विषय सामग्री होगी | स्वयं को स्वयं से ही विश्लेषित करना दूसरो
से नही वरना कभी भी अपनी जिंदगी के अध्याय नही लिख पाओगे | वो किताब के के पन्ने अधूरे
ही रह जायेंगे | उन्हें पूर्ण और सार्थिक बनाना है तो जीवन की आधारभूत मूल्यों को शुरुआत
से ही स्थापित करना पड़ेगा |
क्योंकि अगर हमारी समझ में यह आ गया कि
हमारे अंतर्मन से संतुष्टि है । बाहरी
भौतिक वस्तुओ से नहीं, तो
हमारा जीवन सुखमय हो जायेगा | बस कभी अपने सपने पुरे करने के लिए, किसी और के सपने
मत दबा देना |
आप सभी के मन में ये विचार आ रहा होगा
की ऐसा क्या है इस विचार में कि हमने इस
विचार को जिंदगी एक किताब है ऐसा नाम दिया इसका कारण हम सभी जानते है जैसे किताब
में कई सारे पन्ने होते है और हर पन्ने का अपना अलग ही मकसद, अलग ही विचार और अलग
ही विषय होता है, वैसे ही मनुष्य की जिंदगी में भी कई सारे पन्ने होते है जिसे हम
सभी आम भाषा मे उद्देश्य या लक्ष्य, या कोई उसे जिंदगी के पल, कोई उसे जीना, कोई
उसे मजा, कोई उसे सजा, अनेक नामो से उसे विभूषित करता है | क्योकि इन्सान के जीवन
का हर पल कुछ नया लाता है और कुछ नया सिखाता है |
इस बात को साबित करने
के लिए एक छोटी सी कविता है वो कितनी सार्थक है -
|| संघर्ष में आदमी
अकेला होता है ,सफलता में सब उस के साथ होते है ,
जब-जब जग उस पर हँसा
है ,तब तब उसी ने इतिहास रचा है ||
ये बाते सुनने में
बहुत छोटी सी है मगर यह यतार्थ सत्य है | ऐसे ही मनुष्य का जीवन है जो किताबो के
पन्नो की तरह पलटता रहता है |
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