Wednesday, 6 January 2016

धरती पुत्र

मै धरती पुत्र हूँ
मै किसान हूँ
मै आज अपनों से ही बहुत त्रस्त हूँ,
मै भूखा हूँ मै नंगा हूँ, मै अनपढ़ हूँ, मै गरीब हूँ, क्योकि मै तेरा पुत्र हूँ,
मेरी आवाज में करुणा है,
मेरी देह में माटी की धूल है,
मै मेहनत दया की मूरत हूँ,
मै परोपकार की भावना मन में लिए कार्य करता हूँ,
मै दर्द सहता हूँ मै छाव की आस  नही करता,
मै दर्द की चिंता नही करता, मुझे आराम नही काम चाहिए ,काम का सही दाम चाहिए।
घर मेरे बुढे माँ बाप अच्छी फसल होने का इन्तजार करते है कि उनकी अंधी आँखों का इलाज हो सके , मुझसे जुड़े हुए लोग फसल काटने पे अपने सपनों को पूरा करने का स्वप्न देखते है,
पत्नी और बच्चे खुशियों का इंतजार करते है मेरी बहन अपनी शादी के सपने देखती है हाय मेरी किस्मत एक दिन पर्यावरण असंतुलन के कारण सब ख़त्म हो जाता है और मै लाचार सब देखता रहता हूँ मेरा मन रोता है,
मगर मुझे अनेक परिवार की तश्वीर दिखाई देती है मै डर जाता हूँ मै अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होने के लिए आत्महत्या जैसा आसान काम चुनने एक दुःसाहस करने का प्रयास करता हूँ
पर मै इतना कायर हूँ मै वो भी नही कर पाता, मै घर गिरवी रख माँ बाप का इलाज और खेत गिरवी रख बहन की शादी और इन लोकतृष्णायो से मुक्त होने के बाद मै धरती पुत्र अपनी धरती माँ की गोद में समां जाता हूँ।
हे ईश्वर मुझे क्षमा करना मै क्या करता ये समाज मुझ धरती पुत्र को अनपढ़ जाहिल और भिखारी कहता है।
मेरा दीआ हुआ खाता है मुझे ही दुतकारता है।
पर मुझे गर्व है मै धरती पुत्र हूँ, मै तेरा पुत्र हूँ  ,फिर मेरे साथ अन्याय क्यों क्यों माँ क्यों,
मुझे जवाब चाहिए।

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